आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट निलेश ओझा ‘संविधानी’ और उनके समविचारी सहयोगियों के लिए कार्य ही उनकी पहचान माना जाता है। उनके निरंतर प्रयासों और प्रत्यक्ष सामाजिक हस्तक्षेपों के कारण इस आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ है। यहाँ शब्दों से अधिक कार्य और परिणाम बोलते हैं।
उन्होंने पिछले तीन दशकों से अधिक समय तक विभिन्न सामाजिक और विधिक प्रयासों के माध्यम से संवैधानिक प्रतिबद्धता और सामाजिक समरसता का उदाहरण प्रस्तुत किया है। विभिन्न जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रों से जुड़े सहयोगियों के साथ मिलकर उन्होंने “संविधान धर्म” की अवधारणा को केवल विचार के रूप में नहीं बल्कि व्यवहार में उतारने का प्रयास किया — कि हर भारतीय एक व्यापक राष्ट्रीय परिवार का सदस्य है।
इस यात्रा के दौरान उन्होंने कई प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय व्यक्तियों तथा संस्थागत शक्तियों से जुड़े मामलों में भी विधिक मार्ग अपनाया और सार्वजनिक जवाबदेही की मांग उठाई।
कोविड टीकाकरण से संबंधित मृत्यु के प्रश्न, तथाकथित “वैक्सीन मर्डर” केस, दिशा सालियन और सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण, सहारा इंडिया परिवार के निवेशकों के मुद्दे तथा ईमानदार अधिकारियों और न्यायनिष्ठ व्यक्तियों के समर्थन से जुड़े विषयों पर भी उन्होंने लंबे समय तक सक्रिय भूमिका निभाई।
इन सभी प्रयासों को संवैधानिक प्रक्रिया और विधिक ढांचे के भीतर आगे बढ़ाया गया। उद्देश्य किसी व्यक्ति को लक्ष्य बनाना नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णयों में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित के प्रश्न उठाना बताया जाता है।
उन्होंने केवल आरोपित व्यक्तियों के विरुद्ध कानूनी लड़ाइयाँ ही नहीं लड़ीं, बल्कि जहाँ व्यवस्था ईमानदारी, राष्ट्रहित और न्यायनिष्ठा के साथ कार्य करती दिखाई दी, वहाँ उसका खुलकर समर्थन भी किया। कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारियों, न्यायाधीशों और सरकारी अधिकारियों के समर्थन में भी वे दृढ़तापूर्वक खड़े रहे।
इस संतुलित दृष्टिकोण — अर्थात् गलत के विरुद्ध कठोर रुख और ईमानदारी के प्रति स्पष्ट समर्थन — ने सामान्य नागरिकों में यह विश्वास मजबूत किया कि संविधान और कानून के माध्यम से भी व्यवस्था में परिवर्तन संभव है।
सिद्धांत आधारित दृष्टिकोण:
उनकी कार्यशैली का मूल किसी व्यक्तिगत संघर्ष में नहीं बल्कि सिद्धांतनिष्ठ दृष्टिकोण में निहित बताया जाता है।
उन्होंने एक मूल मंत्र दिया —
“यह मत देखो कि कौन सही है, बल्कि यह देखो कि क्या सही है और कानूनन क्या आवश्यक है।” (Don’t see who is right. See what is right and lawful.)
इस दृष्टिकोण का अर्थ यह है कि निर्णय व्यक्ति-आधारित नहीं बल्कि सिद्धांत-आधारित होने चाहिए; भावनाओं या व्यक्तिपूजा पर नहीं बल्कि तथ्यों, न्याय और विधि पर आधारित होने चाहिए।
उन्होंने व्यक्ति से अधिक सिद्धांत, पद से अधिक संविधान, और शक्ति से अधिक कानून को महत्व दिया। इसलिए उनके हस्तक्षेपों को व्यक्तिगत विरोध के रूप में नहीं बल्कि संस्थागत पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की दिशा में प्रयास के रूप में देखा जाता है।